प्रदेश के 32 डीपीई को डिमोट करने का मामला

प्रदेश के 32 डीपीई को डिमोट करने का मामला

याचिका कर्ताओं के वकीलों की कोर्ट में जबरदस्त पैरवी, अतिरिक्त महाधिवक्ता से हुई तीखी बहस

हिसार, 22 दिसंबर  रवि पथ :

शिक्षा विभाग की ओर से प्रदेश के 32 डीपीई को डिमोट कर वापस मूल कैडर पर भेजने के आदेशों के खिलाफ 23 याचिका कर्ताओं के वकीलों ने बुधवार को जस्टिस लीजा गिल की कोर्ट में मजबूती के साथ अपना पक्ष रखा। हालांकि हरियाणा सरकार की तरफ से पेश हुई अतिरिक्त महाधिवक्ता कीर्ति सिंह ने कहा कि विभाग 15 दिसंबर के उक्त आदेशों को वापस ले रहा है और अब नए सिरे से सभी को कारण बताओ नोटिस दिया जाएगा। इस पर याचिकाकर्ताओं की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता आरके मलिक, लाल बहादुर खोवाल, पंकज चुघ अधिवक्ताओं ने कहा कि इस मामले में उनका याचिका दायर करने का आधार केवल कारण बताओ नोटिस न देने का ही नहीं है। इसके इलावा और भी कई कारण है, जिनको याचिका में दर्शाया गया हैं। उन्होंने तर्क दिया कि सरकार ने सुखविंदर बनाम हरियाणा सरकार के अनुसार डीपीई की प्रमोशन की गई थी, लेकिन अब उसको ही आधार बनाकर उनको डिमोट किया जा रहा है, जो सीधे तौर पर कोर्ट के आदेशों की अवमानना है। इसके अलावा विभाग ने प्रिंसिपल ऑफ नैचुरल जस्टिस के खिलाफ जाकर डिमोशन का आदेश पारित किया गया है। उन्होंने कहा कि जब इन जेबीटी अध्यापकों को प्रमोशन दी गई थी, उस समय से लेकर आज तक उन्हें किसी तरह का कोई वित्तीय फायदा इनको नहीं हुआ है। यानि सरकार को किसी तरह का वित्तीय घाटा नहीं हुआ है और उसी ग्रेड पर ये सभी डीपीई नौकरी कर रहे हैं। उन्होंने कोर्ट को बताया कि डीपीई बनने के बाद सभी शिक्षकों की एसीआर बहुत अच्छी रही है और उन्हें नौकरी करते हुए प्रमोशन के बाद 10-10 साल से भी ज्यादा हो चुके हैं और अब उनकी नौकरी भी कंफर्म हो चुकी है। वरिष्ठ अधिवक्ता आरके मलिक ने कहा कि उनका केस डालने का आधार केवल कारण बताओ नोटिस ना देना ही नहीं है। इसलिए उक्त अन्य तथ्यों पर भी ध्यान दिया जाए।
बॉक्स- कोर्ट के रिलीफ ऑर्डर से भी परेशान है कर्मचारी विरोधी सरकार- एडवोकेट खोवाल
एडवोकेट खोवाल ने कहा कि माननीय कोर्ट ने कर्मचारियों के हित में स्टे आदेश का फैसला देकर उनकी पदावनति पर रोक लगा दी है। ऐसे में कोर्ट के इस रिलीफ से सरकार परेशान है। अतिरिक्त महाधिवक्ता ने नए सिरे से संबंधित डीपीई को शोकॉज नोटिस देने का बयान देकर सरकार की मंशा को साफ कर दिया है। उन्होंने कहा कि सरकार सुखविंद्र वर्सिज हरियाणा स्टेट केस को गलत तरीके से परिभाषित करते हुए डीपीई को हटाने की साजिश रच रही है। उन्होंने हैरत जताई कि जिस आदेश के तहत डीपीई की पदोन्नति हुई, उन्हीं आदेशों की अवमानना करते हुए सरकार इन शिक्षकों को परेशान करने पर तुली है। यह सीधे तौर पर कोर्ट की भी अवमानना है। उन्होंने कहा कि अगर सरकार ने संबंधित शिक्षकों को शोकॉज नोटिस देकर उनकी पदावनति करने की कोशिश की तो उक्त तथ्यों के आधार पर सरकार को एक बार फिर मुंह की खानी पड़ेगी।