पानी की टंकी के पास की जमीन पर पुलिस द्वारा कब्जा लेने के प्रयास का मामला

पानी की टंकी के पास की जमीन पर पुलिस द्वारा कब्जा लेने के प्रयास का मामला

पहले भी पुलिस ने झूठा मुकदमा दर्ज करके, कब्जा लेने का किया था प्रयास

किन्तु किशोरी व उसका बेटा हुआ था बरी और 4 पुलिस वालों को हुई थी सजा

इस जमीन पर 1993 से पहले से है पुलिस की नजर, हर न्यायालय में हारा पुलिस विभाग

नारनौल रवि पथ :

पुलिस विभाग द्वारा न्यायालय में मुकदमा हारने के बाद अवैध तरीके से कब्जा लेने के प्रयास किए जाने का मामला गत तीन दिनों से सुर्खियों में है। जिस तरीके से पुलिस विभाग कब्जा लेने पहुँचा था, उस तरीके की आमजन ने कड़ी आलोचना की है। उस मामले में अब एक नया खुलासा हुआ है। पुलिस विभाग की इस जमीन पर नजर वर्ष 1993 से पहले से ही है। वर्ष 1993 में प्लाट नम्बर एमईपी 1858 के मालिककाबिज किशोरी लाल सैनी तथा प्लाट नम्बर 1861 के मालिककाबिज जितेन्द्र सैनी पर फर्जी दस्तावेज रच कर पुलिस सुपरिटैण्डैन्टी की जमीन पर नक्शा पास करने का आरोप लगाते हुए थाना नारनौल में एफआईआर नम्बर 51 दर्ज की गई थी। उक्त मुकदमें में उक्त किशोरी लाल व जितेन्द्र को सजा करवाने के लिए तत्कालीन एसडीएम अनुराग रस्तोगी आईएएस, बिजली विभाग, टेलीफोन विभाग, कस्टोडियन विभाग व पुलिस विभाग के 12 गवाहों ने गवाही दी थी। किन्तु उसके बाद भी पुलिस उक्त दोनों प्लाटों पर ना तो अपना स्वामित्व साबित कर पाई तथा ना ही यह साबित कर पाई कि किशोरी लाल व जितेन्द्र ने उक्त प्लाट के संबंध में कोई फर्जी दस्तावेजी तैयार किए हैं। जबकि न्यायालय ने गवाह अनुराग रस्तोगी आईएएस, जो गवाही देने के समय गुरुग्राम के उपायुक्त थे, की रिपोर्ट की निष्पक्षता पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया था। उक्त मुकदमें में किशोरी लाल व जितेन्द्र ने साबित कर दिया था कि प्लाट नम्बर एमईपी 1858 किशोरी लाल ने वर्ष 1987 में खरीद किया था तथा प्लाट नम्बर एमईपी 1861 को जितेन्द्र ने कस्टोडियन विभाग से सीधे निलामी में छुडवाया था। किशोरी लाल के अधिवक्ता पौत्र राजेश सैनी ने बताया कि उक्त झूठा मुकदमा जो किशोरी लाल व जितेन्द्र के खिलाफ पुलिस ने उक्त प्लाट को हड़पने के लिए दबाव बनाने के लिए दर्ज किया था, उसमें अतिरिक्त मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी की अदालत ने उन्हें 2006 में बाईज्जत बरी कर दिया था।

पुलिस द्वारा उक्त किशोरी लाल व जितेन्द्र सैनी पर झूठा मुकदमा दर्ज करके गिरफ्तार करने, मारपीट करने तथा उनकी मानहानी करने के लिए जितेन्द्र सैनी ने पुलिस कर्मचारियों पर एक इस्तागासा दायर किया था। जिसमें अतिरिक्त मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के न्यायालय ने तत्कालीन एसएचओ जय नारायण, नत्थुराम बिश्नोई एएसआई, कास्टेबल मानसिंह व रणजीत चार पुलिसकर्मियों को दोषी करार देते हुए उन्हें धारा 323 आईपीसी के अपराध के लिए 3 माह एवं 500 रुपए जुर्माना तथा धारा 500 आईपीसी के अपराध के लिएं 6 माह के सश्रम कारावास व 500 रुपए जुर्माने की सजा सुनाई थी। उक्त मामले से संबंधित अपील अब माननीय उच्च न्यायलय में लंबित है।

इसके अतिरिक्त पुलिस विभाग दिवानी दावा में भी अतिरिक्त जिला जज के न्यायालय से हार का मुंह देख चुका है। उक्त आदेश की इजरा की पालना में न्यायालय के आदेश पर 2012 में किशोरी लाल को उक्त जमीन का कब्जा दिलाया जा चुका है। लेकिन पुलिस विभाग अब भी उक्त प्लाटों पर अपनी दृष्टी जमाए बैठा है।

राजेश सैनी एडवोकेट का कहना है कि अब भी पुलिस विभाग उसके दादा व पिता के उक्त प्लाटों में हस्तक्षेप करने से बाज नहीं आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि 27 मई को पलिस विभाग व नगर परिषद के अधिकारियों के विरूद्ध माननीय उच्च न्यायालय में कन्टेम्प्ट दायर करने तथा नारनौल न्यायालय में मानहानि का मुकदमा दायर करने पर विचार कर रहे हैं।