एचएयू के वैज्ञानिक किसानों को गाजर घास के नुकसान के प्रति कर रहे जागरूक

August 20, 2021

एचएयू के वैज्ञानिक किसानों को गाजर घास के नुकसान के प्रति कर रहे जागरूक

प्रदेशभर में चलाए जा रहे जागरूकता सप्ताह व उन्न्मूलन

अभियान के तहत दे रहे जानकारी, गाजर घास से फसल की पैदावार में 40 प्रतिशत तक हो सकती है कमी

एचएयू व जबलपुर के खरपतवार अनुसंधान निदेशालय के संयुक्त तत्वावधान में हो रहे कार्यक्रम

हिसार 20 अगस्त  रवि पथ :

गाजर घास न केवल फसलों के लिए बल्कि पर्यावरण के साथ-साथ इंसानों के स्वास्थ्य पर भी विपरित असर डालती है। इसी को ध्यान में रखते हुए चौधरी सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार के वैज्ञानिक लगातार प्रदेश भर में गाजर घास के प्रति किसानों को जागरूक कर रहे हैं। इसी कड़ी में विश्वविद्यालय के अनुसंधान क्षेत्र में गाजर घास जागरूकता सप्ताह व उन्न्मूलन अभियान चलाया गया। इस दौरान अनुसंधान निदेशक डॉ. एस.के. सहरावत ने कहा कि गाजर घास से फसल की पैदावार में चालीस प्रतिशत तक कमी हो सकती है। इसलिए समय रहते समन्वित प्रबंधन से इस खरपतवार पर नियंत्रण किया जा सकता है। कार्यक्रम का आयोजन सस्य विज्ञान विभाग द्वारा जबलपुर के खरपतवार अनुसंधान निदेशालय के सहयोग से किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि इस पौधे का प्रवेश हमारे देश में अमेरिका से आयात होने वाले गेहूं के साथ साल 1955 में हुआ था। अब यह पौधा संभवत देश के हर हिस्से में मौजूद है और लगभग 35 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैल चुका है। जब यह एक स्थान पर जम जाती है, तो अपने आस-पास किसी अन्य पौधे को जमने नहीं देती है जिसके कारण अनेकों महत्वपूर्ण जड़ी-बूटियों और चरागाहों के नष्ट हो जानें की सम्भावना पैदा हो गई है। यह न केवल स्वास्थ्य बल्कि पर्यावरण के लिए भी हानिकारक घास है। इस घास के कारण मनुष्यों के अलावा पशुओं में भी बीमारी के लक्षण आने लगे हैं। गाजर घास के एक पौधे से लगभग 10000 से 20000 बीज पैदा होते हैं, जोकि जमीन में पुन: नमीं पाकर अंकुरित हो जाते हैं। उन्होंने आह्वान किया कि इस घास के नियंत्रण के लिए हम सभी को सामूहिक प्रयास करने होंगे तभी हम इसे नियंत्रित कर सकते हैं और प्राकृतिक वनस्पतियों को खत्म होने से बचा सकते हैं।
खरपतवार नियंत्रण के लिए बताए तरीके
वैज्ञानिक डॉ. सतबीर सिंह पूनियां ने बताया कि इस घास के निवारण हेतु कुछ शाकनाशियों के प्रयोग जैसे एट्राजिन /मेट्रिब्यूजिन (0.5 प्रतिशत) व ग्लाइफोसेट (1-1.5 प्रतिशत) का प्रयोग करके इस खरपतवार को नष्ट किया जा सकता है। उन्होंने इस घास से कम्पोस्ट बनाने का तरीका बताते हुए खरपतवार की रोकथाम के सामूहिक उपाए भी बताए। सस्य विज्ञान विभाग के वैज्ञानिक डॉ. टोडरमल पूनियां, डॉ. ए. के. ढाका, डॉ. परवीन कुमार, डॉ. रामधन, डॉ. नीलम, डॉ. कविता, डॉ. कौटिल्य, डॉ. सुशील, सत्यनारायण और अन्य कर्मचारी भी मौजूद थे। इस कार्यक्रम के अंतर्गत हरियाणा के विभिन्न हिस्सों में स्थापित कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्मय से किसानों को गाजर घास के नुकसान के बारे में अवगत करवाया जाएगा।